‘जैनदर्शन’: पारिभाषिक कोश’ विभिन्न शब्कोशों की परम्परा में एक अत्यंत छोटा सा कोश है इसमें जैन तत्वज्ञान, आचार-शास्त्र, कर्म सिद्धांत, भूगोल और पौराणिक चरित्र आदि विषयों से सम्बंधित पंद्रह सौ शब्दों का संक्षिप्त परिचय दिया गया है, जो अनेक महत्वपूर्ण और प्रमाणिक जैन ग्रंथों के आधार पर लिखा गया है

विशालकाय कोशों की बहुमूल्य सामग्री का संचयन करने वाले इस ‘ मिनी ’ शब्दकोश की महत्ता और उपयोगिता जैन धर्म और दर्शन में रूचि रखने वाले सामान्य पाठकों के लिए अधिक है

जैनदर्शन  पारिभाषिक-कोश

यह सच है कि धर्म कुछ शब्दों के अर्थ समझ लेने या कुछ क्रियाओं के दोहरा लेने से समझ में आने वाला नहीं है वह शब्दातीत है । यह भी सच है कि धर्म का रहस्य अनुभव से ही खुलता है । धर्म एक प्रयोग है वह सिर्फ़ विचारों का जोड़ नहीं है पर क्या करुँ शब्दातीत और अनुभवगम्य धर्म का क ख ग सीखने में शब्द मदद करते हैं और अनुभव की ऊँचाईयाँ छूने के लिए श्रेष्ठ विचारों की ठोस जमीन पर पैर टिकाना पड़ता है, सो जैनदर्शन के अनुभवी आचार्यों के द्वाराकहे गए कुछ शब्दों और उनके भावों का परिचय इस शब्द कोश में संग्रहीत करने का प्रयास कर रहा हूँ । यह कार्य बड़े धैर्य और सतत् श्रुताभ्यास का है । यदि मैं अल्पज्ञता और प्रमादवश कहीं चूक गया होऊॅ तो सभाल लीजिएगा । कहीं कुछ छूट गया हो तो जोड़ लीजिएगा ।

मेरा मन था एक छोटा सा शब्द कोश इस तरह का हो कि उसे व्यक्ति हमेशा अपने साथ रखे और समय पर तत्काल उससे लाभ ले सके । जैनदर्शन के कुछ शब्द इतने “यूनिक” और “टेक्नीकल” है कि उनका अर्थ विशेष अध्ययन के उपरान्त ही स्पष्ट हो पाता है । सामान्य पाठक कई बार जैनदर्शन का अध्ययन करते समय या धर्मोंपदेश आदि सुनते समय शब्दों का अर्थ स्प्ष्ट न हो पाने के कारण मुश्किल का अनुभव करता हे । उसे तत्क्षण अर्थबोध हो सके और अध्ययन-चिंतन-मनन में आसानीहो, इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए यह लघुतम प्रयास किया है ।

लगभग पाँच-छ्ह वर्ष तक निरन्तर चिन्तन-मनन और विचार-विमर्श के उपरान्त इस शब्दकोश को प्रस्तुत कर पाया हूँ । इन परिभाषाओं को जानने से यदि धर्म को समझने और अनुभव करने में आसानी हो तो इसे पूर्वाचार्यों की कृपा और उपकार मानिएगा, मैं तो निमित्त मात्र हूँ ।

अपने परम गुरु आचार्य श्री विद्यासागर जी को सादर समर्पित

 मुनि क्षमासागर

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अकाम-निर्जरा –  अपनी इच्छा के बिना इन्द्रिय-विषयों का त्याग करने पर तथा परवश होकर भोग-उपभोग का निरोध होने पर उसे शान्ति से सह लेना, इससे जो कर्मों की निर्जरा होती है उसे अकाम-निर्जरा कहते हैं ।

अकाल-मृत्यु –  विषभक्षण आदि किसी बाह्य कारण के मिलने पर समय से पहले ही आयु का क्षीण हो जाना अकाल-मृत्यु है । इसे कदलीघात-मरण भी कहते हैं ।

अक्षमृक्षणवृत्ति –  जैसे व्यापारी लोग कीमती सामान से भरी गाड़ी मेंसाधारण सा तेल आदि चिकना पदार्थ डालकर उसे आसानी से ले जाते हैं इसी प्रकार साधु भी रत्न्त्रय से युक्त शरीर रुपी गाड़ी में सरस या नीरस आहार डालकर उसे आसानी से मोक्ष मार्ग पर ले जाते हैं, इसलिए साधु की यह आहारचर्या अक्षमृक्षणवृत्ति कहलाती है ।

अक्षिप्र अवग्रह –  वस्तु को शनै:-शनै: देर से जान पाना अक्षिप्र अवग्रह है ।

अक्षीण-महानस ऋद्धि – जिस ॠद्धि के प्रभाव से मुनि केद्‍वारा आहार ग्रहण कर लेने के उपरान्त उस रसोईघर में बचा शेष आहार अनगिनत लोगों को खिला देने पर भी समाप्त नहीं होता वह अक्षीण-महानस-ऋद्धि कहलाती है ।

अक्षीण-महालय ऋद्धि – जिस ऋद्धि के प्रभाव से मुनि के समीप अल्पस्थान में भी अनगिनत जीव सुखपूर्वक आसानी से बैठ जाते हैं वह अक्षीण-महालय-ऋद्धि कहलाती है ।

अगाढ़ – जिस प्रकार वृद्ध पुरुष की लाठी हाथ में रहत हुए भी काँपती रहती है उसी प्रकार क्षयोपशम सम्यग्दृष्टि जीव सच्चे देव शास्त्र गुरु की श्रद्धा में स्थित रहते हुए भी सकम्प होता है और किसी विशेष जिनालय या जिनबिम्ब के प्रति ’यह मेरा है’ या यह दूसरे का है’ – ऐसा विचार करता है यह क्षयोपशम सम्यग्दर्शन का अगाढ़ दोष कहलाता है ।

अगुप्ति-भय– जिसमें किसी का प्रवेश असानी से न हो सके ऐसे स्थान में जीव निर्भय होकर रहता है लेकिन जो स्थान खुला हो वहा रहने से जीव को जो भय उत्पन्न होता है उसे अगुप्ति- भय कहते हैं ।

अगुरुलघु- गुण – जिस गुण के निमित्त से द्रव्य का द्रव्यपना सदा बना रहे अर्थात् द्रव्य का कोई गुण न तो अन्य गुण रुप हो सके और न कोई द्रव्य अन्य द्रव्य रुप हो सके तथा जिसके निमित्त से प्रत्येक द्रव्य में षट्गुणी हानि-वृद्धि होती रहे उसे अगुरुलघु- गुण कहते हैं। अगुरुलघु गुण का यह सूक्ष्म परिणमन वचन के अगोचर है और मात्र आगम प्रमाण से जानने योग्य है।

अगुरुलघु-नामकर्म – जिस कर्म के उदय से जीव न तो लोहपिण्ड के समान भारी होकर नीचे गिरता है और न रुई के समान हल्का होकर ऊपर उड़ता है वह अगुरुलघु-नामकर्म कहलाता है।

अगृहीत-मिथ्यात्व – जो परोपदेश के बिना मात्र मिथ्यात्व कर्म के उदय से सच्चे देव- शास्त्र-गुरु के प्रति अश्रद्धान रुप भाव होता है उसे अगृहीत-मिथ्यात्व कहते हैं।

अग्निकाय – अग्निकायिक जीव के द्वारा छोडा गया शरीर अग्निकाय कहलाता है।

अग्निकायिक – अग्नि ही जिसका शरीर है उसे अग्निकायिक कहते हैं।

अग्निचारण ऋद्धि – जिस ऋद्धि के प्रभाव से साधु अग्निशिखा में स्थित जीवों की विराधना के बिना उन विचित्र अग्निशिखाओ पर से गमन करने में समर्थ होता है वह अग्निचारण ऋद्धि है।

अग्निजीव– जो जीव अग्निकायिक में उत्पन्न होने के लिए विग्रहगति में जा रहा है उसे अग्निजीव कहते हैं।

अग्रायणी पूर्व – जिसमें क्रियावाद आदि की प्रक्रिया और स्व-समय का विषय विवेचित है वह अग्रायणी नाम का दूसरा पूर्व है।

अघातिया-कर्म – जो जीव के अनुजीवी गुणों का घात नहीं करते, पर बाह्य शरीरादि से सबंधित हैं वे अघातिया कर्म कहलाते हैं। आयु, नाम, गोत्र और वेदनीय ये चार अघातिया-कर्म हैं।

अङ्ग-निमित्त्ज्ञान– मनुष्य व तिर्यचो के अङ्ग और उपाङ्गों को देख कर या छूकर शुभ-अशुभ और सुख-दुःख आदि को जान लेना अङ्ग-निमित्तज्ञान है।

अङ्ग-प्रविष्ट – श्रुतज्ञान के आचारादि रुप एक-एक अवयव को अङ्ग कहते हैं। आचाराङ्ग आदि बारह प्रकार का श्रुत्ज्ञान अङ्ग-प्रविष्ट कहलाता है।

अङ्गबाह्य – महान्‌आचार्यों के द्‌वाराअल्पबुद्धि, अल्पायु और अल्पबलवाले शिष्यों के अनुग्रह के लिए आचाराङ्ग आदि बारह अङ्गो के आधार पर रचे गये संक्षिप्त ग्रंथों को अङ्गबाह्य कहते हैं।

अङ्गार-दोष – साधु यदि अत्यन्त आसक्त होकर आहार ग्रहण करे तो वह अङ्गार-दोष कहलाता है।

अङ्गोपाङ्ग नामकर्म – जिस कर्म के उदय से शरीर के अङ्ग और उपाङ्गों का भेद होता है उसे अङ्गोपाङ्ग-नामकर्म कहते हैं। यह तीन प्रकार का है -औदारिक-शरीर-अङ्गोपाङ्ग, वैक्रियिक-शरीर-अङ्गोपाङ्ग, आहारक-शरीर-अङ्गोपाङ्ग।

अचक्षुदर्शन – चक्षु इन्द्रिय को छोड़कर शेष चार इन्द्रियों और मन के जो सामान्य प्रतिभास होता है उसे अचक्षुदर्शन कहते हैं।

अचित्त – प्रासुक किए जाने पर जो वस्तु जीव-रहित हो जाती है उसे अचित्त कहते हैं।

अचेलकत्व – वस्त्र आभूषण आदि समस्त परिग्रह का त्याग करके यथाजात नग्न दिगम्बर बालकवत्‌निर्विकार रूप धारण करना अचेलकत्व कहलाता है। वह साधु का एक मूलगुण है।

अचोर्य – दूसरे की वस्तु को उसकी अनुमति के बिना नहीं लेना अचोर्य है।

अचौर्य-अणुव्रत – १ स्थूल चोरी का त्याग करना अचोर्य या अस्तेय-अणुव्रत कहलाता है। २ जन साधारण के उपयोग में आने वाली मिट्टी, पानी, हवा आदि के अतिरिक्त बिना दी हुई दूसरे कीधन-संपत्ति आदि को स्वंय लेना और न ही दूसरे को देना अचौर्य-अणुव्रत है।

अजितनाथ – द्वितीय तीर्थंकर। साकेत नगरी के राजा जितशत्रु और रानी विजयसेना के पुत्र थे। इनकी आयु बहत्तर लाख वर्ष पूर्व थी। शरीर चार सौ पचास धनुष ऊचा और तपाये हुए स्वर्ण के समान कान्ति वाला था। आयु का एक चौथाई भाग बीत जाने पर इन्होंने राज्य सभाला और एक पूर्वाग तक राज्य करते रहे। एक दिन कमलवन को खिलते व मुरझाते देख कर विरक्त हो गए और पुत्र को राज्य देकर जिनदीक्षा ले ली। बारह वर्ष की कठिन तपस्या के बाद इन्हें केवलज्ञान हुआ। इनके संघ में नब्बे गणधर, एक लाख मुनि, तीन लाख बीस हजार आर्यिकाएं, तीन लाख श्रावक व पाँच लाख श्राविकाएं थीं। इन्होंने सम्मेदशिखर से मोक्ष प्राप्त किया।

अजीव-द्रव्य – जो चेतना-रहित है वह अजीव द्रव्य है। पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल – ये पाँच अजीव-द्रव्य है।

अज्ञात-भाव – अज्ञानता या प्रमाद के कारण बिना जाने प्रवृत्ति करना अज्ञात-भाव है।

अज्ञान-मिथ्यात्व – हित और अहित के विवेक से रहित होना अथवा ‘पशुवध धर्म है’ – इस प्रकार अहित में प्रवृत्ति कराने वाला जो उपदेश है वह अज्ञान-मिथ्यात्व है।

अज्ञान-परीषह-जय – अत्यंत कठोर तपस्या करने के उपरान्त भी अवधिज्ञानादि विशेष ज्ञान प्राप्त न होने पर परिणामों में समता रखना अज्ञान-परिषह-जय कहलाता है।

अढ़ाई-द्‍वीप – जम्बूद्वीप, घातकी खंड़ द्वीप और आधा पुष्करवर द्वीप- ये मिलकर अढ़ाई द्वीप है। मनुष्य का निवास और आवागमन इसी अढ़ाई द्वीप में होता है इसलिए इसे मनुष्य-लोक भी कहते है। इसका विस्तार पेंतालीस लाख योजन है।

अणिमा ऋद्धि – शरीर को अणु के बराबर सूक्ष्म बना लेना अणिमा ऋद्धि है। यह देवों को जन्म से ही प्राप्त होती है। तपोबल से मुनियों को भी प्राप्त होती है।

अणुव्रत – हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह, इन पाँच पापों का स्थूल रूप से त्याग करना अणुव्रत कहलाता है। अणुव्रत पाँच है – अहिंसाणुव्रत, सत्याणुव्रत, अचोर्याणुव्रत, ब्रह्‌मचर्याणुव्रत और परिग्रह-परिमाणव्रत।

अण्डज – जो नख की त्वचा के समान कठोर है गोल है और जिसका आवरण शुक्र और शोणित से बना है उसे अण्ड या अण्डा कहते हैं। अण्डे से उत्पन्न होने वाले जीव अण्डज कहलाते हैं।

अतदाकार-स्थापना – वास्तविक आकार से रहित किसी भी वस्तु में ’यह वही है- ऎसी स्थापना कर लेना अतदाकार-स्थापना है। जैसे अनगढ़ पत्थर आदि में देवी-देवताओं की कल्पना कर लेना।

अतिचार – ग्रहण किए गए व्रतों में शिथिलता आना या दोष लगना अतिचार य अतिक्रम कहलाता है।

अतिथि – सयम का पालन करते हुए आहार के लिए आया हुआ साधु अतिथि कहलाता है अथवा जिसके आने की तिथि निश्चित न हो ऐसे निस्पृही सयमी साधु को अतिथि कहते हैं।

अतिथि-संविभाग – अतिथि के लिए श्रद्धा-भक्तिपूर्वक आहार व औषध आदि देना अतिथि-संविभाग नाम का शिक्षाव्रत है।

अतिशय क्षेत्र – जहा तीर्थंकरों के पंचकल्याणक हुए हैं अथवा जिस स्थान पर किसी मंदिर या मूर्ति में कोई असाधारण विशेषता है उसे अतिशय क्षेत्र कहते हैं जैसे- अंतरिक्ष-पार्श्वनाथ, श्रीमहावीरजी, गोम्मटेश्वर-बाहुबली आदि।

अत्र-अवतर-अवतर – यहाँ आये, पधारे। यह पूजा के समय किया जाने वाला आह्‌वान है।

अत्राणभय – आत्मरक्षा में समर्थ न होने पर सुरक्षा के अभाव में जो भय उत्पन्न होता है वह अत्राणभय कहलाता है।

अदत्त-ग्रहण – श्रावक के द्वारा बिना दिया आहारादि यदि साधु ग्रहण कर ले तो यह अदत्त-ग्रहण नाम का अन्तराय है।

अदन्तधोवन – अंगुली, नख, दातौन आदि से दातो को घिसने का त्याग करना अदन्तधोवन व्रत कहलाता है। यह साधु का एक मूलगुण है।

अदर्शन-परीषह-जय – दीर्घकाल तक आत्म-साधन करने के उपरान्त भी ऋद्धि सिद्धि आदि प्रगट न होने पर परिणामों में समता रखना और मोक्षमार्ग के प्रति अवज्ञा का भाव नहीं लाना अदर्शन-परीषह-जय है

अधर्म-द्रव्य – जो जीव और पुद्गल के ठहरने में सहायक होता है उसे अधर्म-द्रव्य कहते हैं। यह द्रव्य समूचे लोक में व्याप्त है। यह अचेतन और अरुपी है। इसका काय वृक्ष की छाया की तरह है जो राहगीर को ठहरने में सहायक है।

अध-कर्म – यदि साधु मन वचन काय से अपने लिए स्वंय आहार बनाए, बनवाए या बनाए गए आहार का समर्थन करे और ऎसा आहार ग्रहण कर ले तो यह अध कर्म नाम का दोष है।

अध प्रवृत्तकरण- जहा नीचे के समयवर्ती किसी जीव के परिणाम ऊपर के समयवर्ती किसी जीव के परिणामों के समान होते हैं वहा के परिणामों का नाम अध प्रवृत्तकरण है।

अधिकरण – अधिष्ठान या आधार को अधिकरण कहते हैं।

अधिगमज-सम्यग्दर्शन – बाह्‌य उपदेशपूर्वक जो सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है वह अधिगमज-सम्यग्दर्शन है।

अधोलोक – समूचा लोक तीन भागों मे विभक्त है। लोक का निचला भाग अधोलोक कहलाता है। इसका आकार वेत्रासन के समान है और विस्तार सात राजू है। अधोलोक में नीचे-नीचे क्रमशः रत्नप्रभा, शर्करा-प्रभा, बालुका-प्रभा, पकप्रभा, धूम-प्रभा, तम-प्रभा और महातम प्रभा – ये सात पृथिवियां हैं। प्रथम पृथिवी के तीन भाग हैं – खर, पक और अब्बहुल। खरभाग और पकभाग में भवनवासी तथा व्यतर देवों के आवास हैं। अब्बहुल भाग से नारकी जीवों के आवास प्रारम्भ होते हे जो बिल के रूप में हैं। सातों भूमियों में कुल चोरासी लाख बिल हैं। इसके नीचे कलकला नामक पृथिवी हहे जहामात्र निगोदिया जीव रहते हैं।

अध्यधिदोष – आहार के लिए साधु को आते देखकर अपनी भोजन-सामग्री में तुरन्त अधिक जल और चावलादि मिलाकर फ़िर पकाना और साधु को देना अध्यधिदोष है।

अध्यात्म – १ समस्त रागादि विकल्पों को छोडकर अपनी निर्मल आत्मा में आचरण करना अध्यात्म है। २ जिस ग्रंथ में अभेद रत्नत्रय की मुख्यता से आत्मस्वरूप का व्याख्यान किया जाता है उसे अध्यात्म शास्त्र कहते हैं।

अध्रुव अवग्रह – १ जो यथार्थ ग्रहण निरतर नहीं होता वह अध्रुव-अवग्रह है। अर्थात्‌जैसा प्रथम समय में शब्द आदि का ज्ञान हुआ था आगे वैसा ही नहीं रह पाता, कम या अधिक होता है वह अध्रुव-अवग्रह है। २ बिजली, दीपक की लौ आदि अध्रुव या अस्थिर वस्तु का ज्ञान होना अध्रुव-अवग्रह है।

अनगार – अगार का अर्थ गृह या घर है। अतः घर-गृहस्थी के ममत्व से रहित निष्परिग्रही साधु को अनगार कहते है।

अनध्यवसाय – गमन करते हुए मनुष्य को जैसे पैरों में तृण आदि का स्पर्श होने पर स्पष्ट मालूम नहीं पडता कि ‘क्या लगा’ अथवा जैसे जंगल में दिशा भूल जाते है उसी प्रकार परस्पर सापेक्ष नयो के अनुसार वस्तु को नहीं जान पाना अनध्यवसाय या विमोह कहलाता है।

अनन्त – निरंतर व्यय होने पर भी जो राशि कभी समाप्त न हो उसे अनन्त कहते हैं।

अनन्तकायिक – एक ही साधारण ( कॉमन ) शरीर में जो अनन्त जीव निवास करते हैं उन्हे अनन्तकायिक-जीव कहते हैं। इन सभी जीवों का जन्म, मरण, आहार और श्वासोच्छ्‌वास आदि सभी क्रियाएं एक साथ होती हैं। मूली, गाजर, अदरक आदि वनस्पतियां अनन्तकायिक होती हैं। (देखिएनिगोद)

अनन्त-चतुष्टय – चार घातिया कर्मों के क्षय होने पर जो अनन्त-दर्शन, अनन्त-ज्ञान, अनन्त-सुख और अनन्त-वीर्य रूप चार गुण आत्मा में प्रकट होते हैं उन्हे अनन्त-चतुष्टय कहते हैं।

अनन्त-ज्ञान – ज्ञानावरण-कर्म के क्षय होने से जो सकल चराचर को जानने वाला ज्ञान आत्मा में प्रकट होता है उसे अनन्त-ज्ञान या केवलज्ञान कहते हैं।

अनन्त-दर्शन – दर्शनावरणीय-कर्म के क्षय से सकल चराचर का सामान्य प्रतिभास रूप दर्शन गुण आत्मा में प्रकट होता है वह अनन्त-दर्शन या केवलदर्शन है।

अनन्तनाथ – चोदहवे तीर्थकर । इक्ष्वाकु वश में राजा सिंहसेन और रानी जयश्यामा के यहाँ उत्पन्न हुए। इनकी आयु तीस लाख वर्ष और ऊँचाई पचास धनुष थी। समस्त शुभ लक्षणों से युक्त इनका शरीर स्वर्ण के समान आभावान था। राज्य करते हुए पंद्रह लाख वर्ष बीत जाने पर उल्कापात देखकर ये वैराग्य को प्राप्त हुए और अपने पुत्र को राज्य देकर गृहत्याग कर दीक्षित हो गये। दो वर्ष की तपस्या के उपरान्त इन्हे केवलज्ञान हुआ। इन्के समवसरण में पचास गणधर, छ्‌यासठ हज़ार मुनि, एक लाख आठ हज़ार आर्यिकाएं, दो लाख श्रावक एवचार लाख श्राविकाएं थीं। इन्होंने सम्मेद-शिखर से मोक्ष प्राप्त किया।

अनन्तवीर्य – वीर्यान्तराय कर्मका क्षय हो जाने पर आत्मा में जो अनन्त सामर्थ्य प्रकट होती है उसे अनन्तवीर्य कहते है।

अनन्त-सुख – मोहनीय कर्म के क्षय से आत्मा में प्रकट होने वाले अनुपम अतीन्द्रिय-सुख को अनन्त-सुख कहते है।

अनन्तानुबंधी-कषाय – जो कषाय अनन्त संसार के कारणभूत मिथ्यात्व को बाधती है वह अनन्तानुबधी कषाय है। इस कषाय के उदय में सम्यग्दर्शन उतपन्न नहीं होता। यह क्रोध, मान, माया और लोभ- इन चार रूपों में होती है।

अनर्थदण्डविरति – जीवों के द्वारा मन, वचन, काय से होने वाली ऎसी क्रिया या प्रवृत्ति जो उपकारी न होकर मात्र पाप का अर्जन कराती है अनर्थदण्ड कहलाती है, इसका त्याग कर देना अनर्थदण्डविरति नामक गुणव्रत है। अनर्थदण्ड के पाँच भेद है – पापोंपदेश, हिंसादान, प्रमादचर्या, अपध्यान और दु श्रुति।

अनाकांक्ष-क्रिया – अज्ञानता और आलस के कारण में कहे गये विधि-विधान का अनादर करना अनाकाक्ष-क्रिया है।

अनाचार – ग्रहण किए गये व्रत या प्रतिज्ञा का भंग होना अनाचार है।

अनात्मभूत-लक्षण – जो वस्तु के स्वरूप में मिला हुआ न हो, उसे अनात्मभूत-लक्षण कहते है। जैसे- टोपी पहने हुए पुरूष का लक्षण टोपी।

अनादि-मिथ्यादृष्टि – जिस जीव ने अनादि काल से अभी तक सम्यग्दर्शन प्राप्त नहीं किया उसे अनादि – मिथ्यादृष्टि कहते है।

अनादेय-नामकर्म – जिस कर्म के उद्य से निष्प्रभ शरीर प्राप्त होत है वह अनादेय-नामकर्म है अथवा जिस कर्म के उदय से अच्छा कार्य करने पर भी गौरव प्राप्त न हो वह अनादेय-नामकर्म है।

अनाभोग-क्रिया – बिना शोधन किए और बिना देखे असावधानीपूर्वक भूमी पर सोना, उठना- बैठना आदि अनाभोग- क्रिया है।

अनायतन – सम्यग्दर्शन आदि गुणों के आधार या आश्रय को आयतन कहते हैं और इनके विपरीत मिथ्यादर्शन आदि के आश्रय या आधार को अनायतन कहते हैं ।

अनाहारक – जिन जीवों के औदारिक आदि शरीर की रचना के योग्य पुद्‌गल-स्कंधों का ग्रहण नहीं होता वह अनाहारक कहलाते हैं । विग्रहगति में स्थित चारो गति के जीव केवली समुद्‌घात की प्रतर और लोकपूरण अवस्था में स्थित सयोग-केवली, अयोग केवली और सिद्ध भगवान् – ये सब अनाहारक होते हैं ।

अनि सृत अवग्रह – वस्तु के किसी एक भाग को देखकर उस वस्तु को पूर्णतः जान लेना अनि सृत अवग्रह कहलाता है । जैसे – पानी में डूबे हाथी की सूंड़ देखकर पूरे हाथी का ज्ञान होना।

अनित्यानुप्रेक्षा – यह शरीर, इन्द्रियाँ और भोग-उपभोग की समस्त सामग्री क्षणभंगुर है पर मोहवश अज्ञानी जीव उसे नित्य या शाश्वत मानकर सुखी-दुखी होत रहता है। इस नश्वर शरीर आदि से ममत्व छोडकर शाश्वत आत्मा का बार-बार चिंतन करना अनित्यानुप्रेक्षा है।

 अनिबद्ध- मंगल – किसी भी ग्रंथ के प्रारम्भ में ग्रंथकार के द्वारा भगवान् को नमस्कार तो किया हो पर उसे किसी श्लोक आदि के रूप में लिपिबद्ध न किया गया हो तो यह अनिबद्ध- मंगल है।

अनिवृत्तिकरण – जिस विशिष्ट आत्म- परिणाम के द्वारा जीव मिथ्यात्व की ग्रंथि को भेदकर सम्यग्‌दर्शन प्राप्त करता है वह अनिवृत्तिकरण कहलाता है।

अनिष्ट ( अभक्ष्य) – जिनके सेवन से वात,पित्त, कफ़ आदि विकार उत्पन्न हो वे पदार्थ अनिष्टकर होने से अभक्ष्य है।

अनिष्टसंयोगज- आर्तध्यान – अप्रिय वस्तु या व्यक्ति के सयोग से निरतर चिन्तित या दु:खी रहना अनिष्टसयोगज-आर्तध्यान है।

अनिसृष्ट – गृहस्वामी आहार दान की इच्छा करे और अन्य लोग मना करे तो दिया गया आहार अनिसृष्ट दोष से युक्त है।

अनिस्सरणात्मक-तैजस – जीव के औदारिक शरीर में रोनक लाने वाला अनिस्सरणत्मक तैजस शरीर है। यह अन्न-पान आदि को पचाने में सहायक होता है और औदारिक आदि शरीर के भीतर स्थित रहता है।

अनिह्र्व – जिस गुरू या शास्त्र से ज्ञान प्राप्त किया है उसका नाम नहीं छिपाना अनिह्र्व है।

अनुकम्पा – दूसरे की पीड़ा से द्रवित हो जाना अनुकम्पा कहलाती है।

अनुक्त – बिना कहे अभिप्राय मात्र से वस्तु को जान लेना अनुक्त-अवग्रह है । जैसे – वीणा के तार संभालते समय ही जान लेना कि ‘इसके द्वारा यह राग बजाया जायेगा’ ।

अनुजीवी-गुण – द्रव्य में विद्‌यमानभाव रूप गुणों को अनुजीवी गुण कहते हैं, जैसे – जीव में विद्यमानज्ञान, दर्शन,चेतना आदि गुण और पुद्‌गल के स्पर्श, रस, रुप आदि गुण।

अनुत्तरोपपादिक-दशाङ्ग – प्रत्येक तीर्थकर के काल में भीषण उपसर्गों को सहन करके वैमानिक देव के रुप में अनुत्तर विमानों मे उत्पन्न होने वाले दश-दश महामुनियों के चरित्र का जिस शास्त्र में वर्णन किया जाता है उसे अनुत्तरोपपादिक-दशाङ्ग कहतेहैं ।

अनुपचरित-असद्‌भ्‌त व्यवहार – संश्लेष सहित वस्तुओं के संबंध को बताने वाला अनुपचरित सद्‌भ्‌त व्यवहार नय है। यह वस्तु को जानने का है ऎसा दॄष्टिकोण है जिसमें पृथक वस्तुओं के बीच होंने वाले संश्लेष संबंध को दृष्टि‍में रखकर कथन किया जाता है जैसे ‘यह जीव का शरीर है’ या ‘यह मेरा शरीर है’ |

अनुपचरित-सद्‌भ्‌त व्यवहार शुद्ध गुण व शुद्ध गुणी में भेद का कथन करना अनुपचरित-सद्‌भ्‌त व्यवहार नय है | यह वस्तु को जानने का ऎसा दॄष्टिकोण है जिसमें एक ही शुद्ध द्रव्य के आश्रित रहने वाले गुणों को उसी द्रव्य अर्थात्‌गुणी से भेद करके कथन किया जाता है जैसे ‘केवल ज्ञान आदि जीव के गुण है’ – ऎसा कहना।

अनुपवास – जल को छोडकर शेष सभी प्रकार के आहार का त्याग करना अनुपवास है या गृह संबधी कार्य करते हुए जो उपवास किया जाता है उसे भी अनुपवास कहते हैं ।

अनुपसेव्य – व्यवहार-धर्म को मलिन करने वाली जो वस्तुऐं सज्जन पुरुषों के द्वारा सेवन करने योग्य नहीं है वे अनुपसेव्य कहलाती हैं । जैसे – गाय का मलमूत्र, लार, कफ़,जूठन,शख-भस्म आदि।

अनुप्रेक्षा – १ संसार, शरीर और भोग सामग्री के स्वभाव का बार-बार चिन्तन करना अनुप्रेक्षा है। अनित्य, अशरण,संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्त्रव, सवर, निर्जरा, लोक, वोधिदुर्लभ औययर धर्म – ये बारह अनुप्रेक्षाऐं हैं । यही बारह भावना भी कहलाती हैं । २ जाने हुये अर्थ का मन में अभ्यास करना अनुप्रेक्षा नाम का स्वाध्याय है।

अनुभय-मन-वचन – सत्य और असत्य दोनों प्रकार के निर्णय से रहित पदार्थ को जानने या कहने में जीव के मन वचन की प्रयत्न रुप प्रवृत्ति को अनुभय-मन-वचन योग कहते हैं । जैसे – ‘यह कुछ है’ – ऎसा जानना या कहना।

अनुभाग-बन्ध – कर्म के फ़ल देने की सामर्थ्य को अनुभव या अनुभाग कहते हैं । ज्ञानावरणीय आदि कर्मों का जो कषायादि परिणामजनित शुभ-अशुभ फल है वह अनुभाग बंध है। वह जिस कर्म का जैसा नाम है उसके अनुरुप होता है।

अनुमति त्याग-प्रतिमा – परिग्रह त्याग नामक नवमी प्रतिमा धारण करने के उपरान्त अपने परिवारजनों को या अन्य जनों को सांसारिक कार्यों के संबध में अनुमति अर्थात्‌सलाह आदि नहीं देने की प्रतिज्ञा करना, यह श्रावक की दसवीं अनुमति-त्याग-प्रतिमा कहलाती है।तो जीव की शेष आयु का पुनः दो तिहाई भाग बीत जाने पर दूसरा अवसर आता है। इस प्रकार भुज्यमान आयु की समाप्ति होने तक नवीन आयु बधने के आठ अवसर होते है, यही अपकर्ष कहलाते है।

अपकर्षण – कर्मों की स्थिति और अनुभाग का घट जाना अपकर्षण कहलाता है।

अपध्यान – व्यर्थ ही दूसरे जीवों के प्रति बाँधने-मारने रूप खोटे विचार मन में लाना अपध्यान नाम का अनर्थदण्ड है।

अपरिग्रह – अतरग में ममत्व – भाव का और बाह्‌य में धन-पैसा, स्त्री, पुत्र आदि समस्त परिग्रह का त्याग कर देना अपरिग्रह है।

अपरिणत – तिल, चावल आदि के धोने का जल, गरम होकर ठंडा हुआ जल या हरड़, लोग आदि चूर्ण से परिणत नहीं हुआ जल साधु को देना अपरिणत दोष है।

अपर्याप्तक – देखिए पर्याप्तक

अपर्याप्तनाम – जिस कर्म के उदय से जीव अपने योग्य पर्याप्तियो को पूर्ण नहीं कर पाते वह अपर्याप्त नामकर्म है।

अपवाद- मार्ग – यद्यपि मोक्षमार्ग में समता-भाव की साधना ही प्रमुख है परन्तु शरीर की स्थिति बनाए रखने के लिए साधु को आहार, विहार आदि भी आवश्यक है। अतः समता-भाव की साधना में कठोर आचरण का पालन करना उत्सर्ग- मार्ग कहलाता है। उत्सर्ग- मार्ग में निवृत्ति प्रमुख है तथा विशेष परिस्थिति में शरीर की रक्षा के लिए मृदु आचरण करना अपवाद- मार्ग है। यह अपवाद-मार्ग शुद्धोपयोगरुप उत्सर्ग-मार्ग में सहायक आहार, विहार, पठन-पाठन आदि शुभ-प्रवृत्ति रुप है।

अपाय-विचय –‘संसारी जीव मिथ्यामार्ग से कैसे बचे’ – इस प्रकार निरंतर चिंतन करना अथवा जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा बताए गये सन्मार्ग क निरंतर चिंतन करना अपाय-विचय या उपाय-विचय नामक धर्मध्यान है।

अपूर्वकरण – मोहनीय कर्म का उपशम या क्षय करने वाले जीव के अन्तर्मुहूर्त तक प्रति समय जो अत्यंत विशुद्ध अपूर्व परिणाम होते हैं वह अपूर्वकरण है।

अपूर्वकरण-गुणस्थान – मोहनीय कर्म का उपशम या क्षय करके जो जीव उपशम या क्षपक श्रेणी चढते हैं उस समय जिस गुणस्थान में सभी जीवों के अपूर्व परिणाम होते हैं वह अपूर्वकरण नामक आठवां गुणस्थान है।

अप्रतिघात-ऋद्धि – जिस ऋद्धि के प्रभाव से साधुजन पर्वत, शिला, वृक्ष आदि के आरपार गमन करने में सक्षम होते है वह अप्रतिघात ऋद्धि कहलाती है।

अप्रतिष्ठित-प्रत्येक – देखिए प्रत्येक वनस्पति ।

अप्रत्याख्यान- क्रिया – त्याग करने का भाव नहीं होना अप्रत्याख्यान क्रिया है।

अप्रत्याख्यानावरण कषाय – जिसके उदय में जीव देश संयम अर्थात्‌अणुव्रत धारण नहीं कर पाता वह अप्रत्याख्यानावरण कषाय कहलातीहै। यह क्रोध- मान -माया- लोभ इन चारों रुपों मे रहती है।

अप्रमत्त-संयत – जो साधु व्यक्त और अव्यक्त रुप समस्त प्रकार के प्रमाद से रहित है और रत्नत्रय से युक्त होकर निरंतर आत्म- ध्यान में लीन रहते हैं वे अप्रमत्त-सयत कहलाते हैं । अप्रमत्त- सयत के दो भेद हैं- स्वस्थान-अप्रमत्त और सातिशय-अप्रमत्त । जो साधु उपशम या क्षपक श्रेणी चढ़ने के सम्मुख है वे सातिशय- अप्रम्त्त संयत कहलाते हैं, शेष साधु स्वस्थान – अप्रमत्त- संयत कहलाते हैं ।

अप्रशस्त-निदान – तीव्र अहंकार से प्रेरित होकर अपनी तपस्या के फलस्वरुप भविष्य में उत्तम कुल, जाति, रुप और भोग – उपभोग की कामना करना अप्रशस्त निदान कहलाता है।

अप्रशस्त-निःसरणात्मक- तैजस – बारह योजन लम्बे, नौ योजन चोडे, सूच्युगल के संख्यातवे भाग मोटे, रक्तवर्ण वाले, पृथिवि व पर्वतादि समस्त वस्तुओं को जला कर नष्ट करने में समर्थ और साधु के बाये कन्धे से प्रगट होकर अभीष्ट स्थान तक फैलने वाले तैजस शरीर को अप्रशस्त-निःसरणात्मक- तैजस कहते हैं । यह अशुभ तैजस शरीर किसी कारणवश क्रोध के वशीभूत हुए तपस्वी साधु के शरीर से क्रोधाग्नि की तरह निकलता है।

अप्रशस्त-राग – भौतिक सुख-सुविधा की सामग्री के प्रति राग बढाने वाली कथा या बातचीत करने में मन लगाए रहना अप्रशस्त-राग है।

अप्रथक्‌विक्रिया – अपने शरीर को सिंह, हिरण, हंस, वृक्ष आदि अनेक रुपों में परिवर्तित करने की सामर्थ्य होना अप्रथक्‌या एकत्व-विक्रिया कहलाती है। यह सामर्थ्य देव व नारकी जीवों में जन्म से ही पायीजाती है तथा मनुष्यों में तप आदि के फलस्वरुप प्राप्त होती है।

अभक्ष्य – जो वस्तुऐं मनुष्यों के खाने योग्य नहीं है ऎसी अखाद्य वस्तुओं को अभक्ष्य कहते हैं । अभक्ष्य वस्तुऐं पाँच प्रकार की हैं – त्रसघात, प्रमादवर्धक, बह्‌घात, अनिष्ट, अनुपसेव्य।

अभयदान – प्राणीमात्र को सुरक्षा और प्रेम देकर आश्वस्त करना अभयदान कहलाता है।

अभव्य – जो कभी भी संसार के दु:खों से छुटकर मोक्ष सुख प्राप्त नहीं कर सकेंगे ऎसे जीव अभव्य कहलाते हैं ।

अभाव जैन दर्शन में वस्तु का सर्वथा अभाव नहीं माना गया, भावान्तर स्वभाव रुप ही अभाव माना गया है। जैसे – मिथ्यात्व पर्याय के अभाव का सम्यक्‌त्व पर्याय रुप से प्रतिभास होता है। अभाव चार प्रकार का है – प्रागभाव, प्रध्वसाभाव, अन्योन्याभाव और अत्यन्ताभाव।किसी द्रव्य की वर्तमान पर्याय का पूर्व पर्याय में अभाव होना प्रागभाव है। आगामी पर्याय में वर्तमान पर्याय का अभाव होना प्रध्वसाभाव है। एक द्रव्य की एक पर्याय का उसकी दूसरी पर्याय में अभाव होना अन्योन्याभाव है। एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य में अभाव होना अत्यन्ताभाव कहलाता है।

अभिनन्दन नाथ – चौथे तीर्थंकर । इक्ष्वाकुवंश में राजा स्वयवर और रानी सिद्धार्था के यहाँ उत्पन्न हुये। इनकी आयु पचास लाख वर्ष पूर्व और ऊँचाई तीन सौ पचास धनुष थी। समस्त शुभ लक्षणों से युक्त इनका शरीर स्वर्ण के समान आभावान था। राज्य करते हुए साढ़े छत्तीस लाख वर्ष पूर्व काल बीत जाने पर एक दिन अचानकमेघों का बिखरना देखकर इन्हें वैराग्य हो गया और इन्होने जिनदिक्षा ले ली। अठारह वर्ष की मौन तपस्या के उपरान्त इन्हें केवलज्ञान हुआ। इनके समवसरण में एक सौ तीन गणधर, तीन लाख मुनि, तीन लाख तीस हजार छ सौ आर्यिकाएं, तीन लाख श्रावक और पाँच लाख श्राविकाएं थीं। इन्होने सम्मेदशिखर से मोक्ष प्राप्त किया।

अभिन्नदशपूर्वी – ग्यारह अङ्गोंका अध्ययन पूर्ण होने के उपरान्त विद्यानुवादवनामक दसवें पूर्व को पढ़ते समय महाविद्याओं के पाँच सौ और लघु-विद्याओं के सात सौ देवता आकर सेवक की तरह उपस्थित हो जाते हैं। उस समय किसी भी प्रलोभन में न पड़कर जो साधु दशवें पूर्व का अध्ययन पूर्ण कर लेते हैं वे अभिन्नदशपूर्वी कहलाते हैं ।

अभिषेक – जिन-प्रतिमा के स्नपन या प्रक्षालन को अभिषेक कहते हैं । इसका मूल उद्देश्य अपने आत्म-परिणामों की निर्मलता है।

अभिहृत – यदि एक पंक्ति में स्थित तीन या सात घरों छोड़कर अन्य किसी घर से आये हुए अन्नादि को साधु ग्रहण कर लेता है तो यह अभिहृत दोष है।

अभीक्ष्ण-ज्ञानोपयोग – अभीक्ष्ण का अर्थ सदा या निरंतर है। जीवादि तत्वविषयक सम्यग्ज्ञान के अभ्यास में निरंतर लगे रहना अभीक्ष्ण-ज्ञानोपयोग है। यह सोलह- कारण भावना में से एक भावना है।

अभोज्य-गृहप्रवेशन – यदि आहार के लिये जाते हुए साधु का चाण्डाल आदि अपवित्र जनों के घरमें प्रवेश हो जाता है तो अभोज्य गृहप्रवेशन नामक अन्तराय है।

अमूट-दृष्टि – अमूट दृष्टि का अर्थ है यथार्थ दृष्टि। अनेक प्रकार के मन-मनोन्नग में सत्य – असत्य का निर्णय करके मोह रहित यथार्थ दृष्टि रखना अमूट दृष्टि नामक गुण है। वह सम्यग्दर्शन का एक अङ्ग है ।

अमृत – जिसमें रुप, रस , गंध और स्पर्श – ये चारों गुण नहीं पाए जाते उसे अमृत या अरुपी कहते हैं । पुद्‌गल द्रव्य को छोड़कर शेष पाँच द्रव्य अमृत या अरुपी हैं ।

अमृतस्त्रावी ऋद्धि – जिस ऋद्धि के प्रभाव से साधु के हाथ में रखा गया सुखा आहार अमृत के समान सरस और गुणकारी हो जाता है अथवा जिसके प्रभाव से साधु के वचन अमृत के समान हितकारी हो जाते है उसे अमृतस्त्रावी ऋद्धि कहते हैं ।

अमेघ्य – यदि आहार के लिए जाते हुए साधु के पैर अपवित्र मल मूत्र आदि से लिप्त हो जाते हैं तो यह अमेघ्य नाम का अन्तराय है।

अयश- कीर्ति – जिस कर्म के उदय से किसी जीव के विद्यमान या अविद्यमान अवगुणों की चर्चा लोक में होने लगती है उसे अयश-कीर्ति- नामकर्म कहते हैं ।

अयोग-केवली-जिन – तेरहवे गुणस्थानवर्ती संयोगकेवली भगवान् जब अपने जीवन के अंतिम क्षणों में विशुद्ध ध्यान के द्वारा मन-वचन-काय की समस्त क्रियाओं का निरोध कर देते हैं तब योग से रहित इस अवस्था में वे अयोग-केवली-जिन कहलाते हैं। यह अंतिम चौदहवा गुणस्थान है।

अयोध्या – जम्बूद्वीप में आर्यखंड के कौशल देश की एक नगरी । यह नगरी सरयू नदी के किनारे इन्द्र द्वारा प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ के पिता नाभिराय और माता मरुदेवी के लिए रची गयी थी । सुकौशल देश में स्थित होने से इसे सुकौशल और विनीत लोगों की निवासस्थली होने से इसे विनीता भी कहा गया है। इसके सुयोजित निर्माण कौशल के कारण इसे शत्रु जीत नहीं सकते थे इसलिए इसे अयोध्या कहा गया। सुंदर भवनों के निर्माण के कारण इसे सांकेत भी कहा जाता था। यह नौ योजन चौड़ी, बारह योजन लम्बी और अड़तालीस योजन विस्तार वाली थी । सभी तीर्थकर सामान्यतः अयोध्या में ही जन्म लेते हैं परन्तु काल के प्रभाव से वर्तमान चौबीसी में कुछ तीर्थंकरों का जन्म अन्यत्र भी हुआ।

अरति – जिस कर्म के उदय में देश, काल आदि के प्रति उत्सुकता नहीं होती है उसे अरति कहते है।

अरति-परिषह-जय – जो साधु विषय – भोग की सामग्री के प्रति उदासीन है, जो गीत, नृत्य वादित्र आदि से रहित अप्रिय लगने वाले शिला गुफा आदि स्थानो में रहकर भी ध्यान अध्ययन में लीन है और देखे, सुने, अनुभव में आए भोगो का स्मरण आने पर भी समता भाव रखते है उनका यह अरति-परिषह-जय है।

अरनाथ – अठारहव तीर्थकर एवं सातवे चक्रवर्ती। सोमवश राजा सुदर्शन और रानी मित्रसेना के यहाँ जन्म लिया। इनकी आयु चौरासी हजार वर्ष थी। शरीर तीस धनुष ऊचा और स्वर्ण के समान आभा वाला था। चक्रवर्ती होने के कारण इनके छ्यानवे हजार रानिया ओर विपुल वैभव था। शरद ऋतु के मेघो का अकस्मात्‌विलय होते देखकर इन्हे वैराग्य हुआ और अपने पुत्र को राज्य देकर इन्होने जिनदीक्षा ले ली । सोलह वर्ष की कठिन तपस्या के उपरान्त इन्हे केवलज्ञान हुआ। इनके समवशरणमें तीस गणधर, पचास हजार मुनि, साठ हजार आर्यिकाएं, एक लाख साठ हजार श्रावक एवं तीन लाख श्राविकाएं थीं। इन्होने सम्मेद-शिखर से मोक्ष प्राप्त किया।

अर्थ-पर्याय – जो सूक्ष्म मेंशब्दो के द्वारा नहीं कही जा सकती और जो क्षण-क्षण में बदलती है वह अर्थ-पर्याय है। यह प्रत्येक द्रव्य में प्रतिक्षण होती रहती है।

अर्थ-समय – कथन के निमित्त से ज्ञात हुए समस्त पदार्थो के समूह को अर्थ – समय कहते है।

अर्थ-सम्यग्दर्शन – आगम को पढ़े बिना ही उसमें प्रतिपादित अर्थ या भाव को जानकर जो सम्यग्दर्शन होता है उसे अर्थ-सम्यग्दर्शन कहते है।

अर्थाचार – शास्त्र में कह गए अनेकात स्वरुप को ठीक-ठीक समझना अर्थाचार या अर्थ शुद्धि है।

अर्थावग्रह – देखिए अवग्रह।

अर्द्धनाराच-सहनन – जिस कर्म के उदय से शरीर में हड्डियो की संधिया परस्पर नाराच अर्थात्‌कील के द्वारा आधी ही जुडी होती है वह अर्द्ध-नाराच सहनन नामकर्म कहलाता है।

अर्द्ध-पुद्‌गल-परावर्तन – देखिए द्रव्य – परिवर्तन

अर्हन्त – जो वीतराग, सर्वज्ञ और हितोपदेशी है वे अर्हन्त परमेष्ठी कहलाते है। अर्हन्त परमेष्ठी तीन लोक में पूज्य होते हैं।

अर्हद्‌भक्ति – अर्हन्त भगवान् के प्रति जो गुणानुराग रुप भक्ति होती है वह अर्हद्‌भक्ति कहलाती है। अथवा अर्हन्त भगवान् के द्वारा कहे गये धर्म के अनुरुप आचरण करना अर्हद्‌भक्ति कहलाती है। यह सोलह कारण भावना में एक भावना है।

अलाभ-परीषह-जय – जो साधु कई दिनों तक आहार प्राप्त न होने पर अलाभ की स्थिति में भी समता-पूर्वक ध्यान-अध्ययन में लीन रहते है और अलाभ की स्थिति को कर्मनिर्जरा का कारण मानकर संतोष धारण करते है उनके यह अलाभ-परीषह-जय है।

अलोक – लोकाकाश के बाहर सब ओर जो अनन्त आकाश है उसे अलोक या अलोकाकाश कहते हैं। अलोकाकाश में एकमात्र आकाश द्रव्य है शेष पा च द्रव्य नही है।

अल्पबहुत्व – परस्पर हीनाधिकता को अल्पबहुत्व कहते है। जैसे – ‘यह इसकी अपेक्षा अल्प है’ और ‘यह अधिक है’ इत्यादि। इसके द्‍वारा क्षेत्रादि की अपेक्षा भेद को प्राप्त हुए जीव आदि की परस्पर संख्या विशेष को जाना जाता है।

अवगाढ़ सम्यग्दर्शन – द्वादशांग के साथ अङ्ग-बाह्य का अध्ययन करके जो दृढ़ सम्यग्दर्शन होता है उसे अवगाढ़ सम्यग्दर्शन कहते है।

अवगाहन – सभी द्रव्यों को अवकाश ( स्थान) देना, यह आकाश का अवगाहन गुण है।

अवगाहना – 1 जीवों के शरीर की ऊँचाई, लम्बाई आदि को अवगाहना कहते है।2 आत्मप्रदेश में व्याप्त करके रहना अवगाहना है। यह दो प्रकार की है – जघन्य और उत्कृष्ट। जैसे- कर्मभूमि के मनुष्य की जघन्य अवगाहना 3 1/२ हाथ और उत्कृष्ट 525 धनुष।

अवग्रह – इन्द्रिय और पदार्थ का संबंध होने पर जो पदार्थ का प्रथम ग्रहण या ज्ञान होता है वह अवग्रह कहलाता है। जैसे – आँख के द्वारा ‘यह सफेद है’ ऐसा ज्ञान होना। अवग्रह दो प्रकार का है – व्यंजनावग्रह और अर्थावग्रह। व्यक्त ग्रहण से पहले-पहले व्यंजनावग्रह होता है और व्यक्त ग्रहण का नाम अर्थावग्रह है।जैसे – माटी का नया घड़ा जल की दो बूंदे सींचने पर गीला नहीं होता और पुन पुन सींचने पर धीरे धीरे गीला हो जाता है इसी प्रकार श्रोत्र आदि इन्द्रिय के द्वारा ग्रहण किए गए शब्द आदि पहले व्यक्त नहीं होते किन्तु पुनः पुनः ग्रहण होने पर व्यक्त हो जाते है। व्यंजनावग्रह इन्द्रियों के ग्रहण करने के योग्य क्षेत्र में पदार्थ के स्थित होने पर ही होता है अतः चक्षु और मन से नहीं होता,शेष चारों इन्द्रियों से होता है। अर्थावग्रह पाचो इन्द्रियों और मन के द्वारा होता है।

अवधिज्ञान – जो द्रव्य, क्षेत्र, काल आदि की सीमा में रहकर मात्र रुपी पदार्थो को प्रत्यक्ष जानता है वह अवधिज्ञान है। अवधिज्ञान के तीन भेद है – देशावधि, सर्वावधि और परमावधि। देशावधि के अनुगामी, अननुगामी, वर्धमान, हीयमान, अवस्थित और अनवस्थित – ऐसे छहभेद है। देशावधि- ज्ञान भव-प्रत्यय और गुण- प्रत्यय दोनों प्रकार का होता है। सर्वावधि और परमावधि यह दोनों गुण -प्रत्यय है।

अवधिदर्शन – अवधिज्ञान से पहले जो रुपी पदार्थों का सामान्यप्रतिभास होता है उसे अवधिदर्शन कहते है।

अवमौदर्य – जो जिसका स्वाभाविक आहार है उससे कम आहार ग्रहण करने की प्रतिज्ञा करना अवमौदर्य – तप है।

अवर्णवाद – गुणवान बड़े पुरुषों में जो दोष नहीं है उन मिथ्या दोषों को उनमें दिखाना अवर्णवाद कहलाता है। केवली, श्रुत, सघ, धर्म और देवो का अवर्णवाद – यह पाँच प्रकार का अवर्णवाद है।

अवसन्न – जैसे कीचड़ में फसे हुए और मार्गभ्रष्ट पथिक को अवसन्न कहते है वैसे ही ज्ञान और आचरण से भ्रष्ट मुनि को अवसन्न कहते है।

अवसर्पिणी – जिस काल में जीवों की आयु, बल और ऊँचाई आदि क्रम- क्रम से घटते जाते है उसे अवसर्पिणी काल कहते है। इसके सुषमा-सुषमा, सुषमा, सुषमा-दुषमा, दुषमा-सुषमा, दुषमा और दुषमा-दुषमा – ऐसे छह भेद है। इन्हे पहले , दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवे और छ्ठे काल के नाम से भी जाना जाता है।

अवाय – विशेष निर्णय द्वारा वस्तु का जो यथार्थ ज्ञान होता है उसे अवाय कहते है। जैसे – पंखो के उठने गिरने आदि को देखकर ‘यह बगुलो की पंक्ति है ध्वजा नहीं है’ – ऐसा निर्णय करना।

अविनेय – जिसमें सच्चे धर्म को सुनने या ग्रहण करने का गुण नहीं है वह अविनेय है।

अविपाक-निर्जरा – जिस प्रकार आम,केला आदि को अधिक उष्मा देकर समय से पहले पका लिया जाता है उसी प्रकार कर्म को तप आदि के द्वारा समय से पहले अनुभव में ले लिया जाता है यह अविपाकनिर्जरा है। अविपाक निर्जरा सम्यग्दृष्टि व्रती के ही होती है।

अविभाग-प्रतिच्छेद – शक्ति अंश को अविभाग- प्रतिच्छेद कहते है। यह जड व चेतन सभी द्रव्यो में देखे जाते हैं । जैसे – सबसे कम अनुभाग से युक्त परमाणु के किसी एक गुण को बुद्धि के द्वारा ग्रहण करके तब तक छेद दिया जाए जब तक कि उससे आगे और विभाग न हो सके, इस विभाग-रहित अंश को अविभागी-प्रतिच्छेद कहते हैं।

अविरत-सम्यग्दृष्टि – जो व्रत आदि से रहित है किन्तु सच्चे देव – शास्त्र – गुरु पे श्रद्धा रखता है वह चतुर्थ गुणस्थानवर्ती जीव अविरत- सम्यग्दृष्टि है।

अविरति –व्रतों को धारण न करना अविरत है। या अव्रत रुप विकारी परिणाम का नाम अविरति है। पाँच स्थावर और त्रस इन छह प्रकार के जीवों की दया न करने से और इन्द्रिय व मन के विषयो से विरक्त न होने से अविरति बारह प्रकार की है।

अशणानुप्रेक्षा – मंत्र, तंत्र, औषध आदि कोई भी मरण के समय प्राणी की रक्षा नहीं कर सकते, अमर कहे जाने वाले स्वर्ग के देव भी आयु समाप्त होने पर मरण को प्राप्त होते हैं। इस संसार में जन्म और मरण के दुखो से यदि कोई वचा सकता है तो वह एक मात्र वीतराग-धर्म है, धर्म की शरण ही श्रेष्ठ है, शेष कोई शरण नहीं है, इस प्रकार बार-बार चिन्तन करना अशरण – अनुप्रेक्षा है।

अशुचित्व-अनुप्रेक्षा – यह शरीर अत्यन्त अपवित्र है, स्नान और अन्य सुगंधित पदार्थो से भी इसकी अशुचिता अर्थात्‌मलिनता को दूर कर पाना सभव नहीं है किन्तु यदि जीव चाहे तो रत्नत्रय की भावना केद्वारा शरीर से भिन्न अपनी आत्मा की शुचिता को प्रगट कर सकता है, इस प्रकार बार-बार चिन्तन करना अशुचित्व-अनुप्रेक्षा है।

अशुभ-तैजस – देखिए अप्रशस्त नि सरणात्मक तैजस।

अशुभ-नामकर्म –देखिए शुभ नामकर्म।

अशुभोपयोग – जिसका उपयोग विषय-कषाय में मग्न है, कुश्रुति, कुविचार और कुसंगति में लगा हुआ है, उग्र है और उन्मार्गगामी है उसके यह अशुभोपयोग है।

अश्रुपात – आहार के समय पीड़ावश साधु के आसु आ जाने पर या किसी कारण से दाता के आंसु आने पर अश्रुपात नामक अन्तराय होता है।

अष्ट-द्रव्य – उत्तम जल, चन्दन, अखण्डित चावल, सुगंधित पुष्प, नैवेद्‌य, सुगंधित धूप, दीप और फल – ये पूजा के अष्ट-द्रव्य कहलाते है।

अष्टम-पृथिवी – लोक के शिखर पर एक राजु चौड़ी, सात राजु लम्बी और आठ योजन ऊची अष्टम पृथिवी है। इसके मध्य में अत्यंत उज्ज्वल छ्त्र के समान ईषतप्राग्भार नाम का क्षेत्र है जिसका विस्तार मनुष्य लोक के बराबर है। यह सिद्धो का आवास स्थान है और अष्टम-पृथिवी से 7050 धनुष ऊपर स्थित है।

अष्ट-मंगल-द्रव्य – छ्त्र, चमर, ध्वजा, झारी, कलश, ठौना, दर्पण और बीजना – ये आठ मांगलिक द्रव्य है जिनसे पाण्डुकशिला और समवसरण के गोपुर शोभित होते रहते है।

अष्टमूलगुण – १ मद्य, मधु और मास का त्याग करना और पाँच अणुव्रतों का पालन करना – ये श्रावक के अष्टमूलगुण है। २ मद्य, मधु , मांस और पाँच उदुम्बर फलो का त्याग करना यह श्रावक के अष्टमूल्गुण हैं। ३ मद्य, मधु, मांस का त्याग, रात्रि-भोजन व उदुम्बर फलो का त्याग तथा देवदर्शन, जीव-दया और जलगालन – ये आठ श्रावक के मूलगुण माने गये है।

अष्टाङ्ग-निमित्तज्ञान – देखिए निमित्तज्ञान।

अष्टापद – यह कैलाश पर्वत का दूसरा नाम है। यह भगवान् ऋषभदेव की निर्वाणभूमि है। इस पर्वत पर सगर चक्रवर्ती के साठ हजार पुत्रो ने स्वर्णमय जिनालय बनाने के लिए दण्डरत्न से आठ पादस्थान बनाकर इसकी भूमि खोदना प्रारंभ किया था इसलिए इसका नाम अष्टापद प्रसिद्ध हुआ।

अष्टाह्रिक-पूजा – देवो के द्वारा नन्दीश्वर-द्वीप में प्रत्येक वर्ष आषाढ़, कार्तिक और फाल्गुन मास में अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक आठ दिन निरंतर भक्तिपूर्वक जो जिनेन्द्र प्रतिमाओ की पूजा की जाती है, उसे अष्टाह्रिक-पूजा कहते है।

असत्य-मन-वचन – असत्य पदार्थ जैसे मरीचिका का जल आदि के विषय में जानने या कहने में जीव के मन और वचन की प्रयत्न रुप प्रवृत्ति को असत्य-मन-वचन योग कहते हैं।

असद्‌भूत-व्यवहार-नय – भिन्न वस्तुओं के बीच सबध को बताने वाला असद्‌भूत व्यवहार नय है। जैसे – कर्म के निमित्त से होने वाली मनुष्यादि पर्याये , रागादि विकारी भाव और बाह्य वस्तुओं से सबधका कथन करना असद्‌भूत व्यवहार नय का विषय है। इसके दो भेद है – अनुपचरित असद्‌भूत और उपचरित असद्‌भूत ।

असंख्यात – गणनानीत राशि असंख्यात कहलाती है।

असंज्ञी – बिना मन वाले जीव असज्ञी कहलाते है। ये शिक्षा, उपदेश आदि ग्रहण करने में असमर्थ होते है। असज्ञी, असैनी और अमनस्क ये एकार्थवाची है।

असंप्राप्तासृपाटिका-सहनन – जिस कर्म के उदय से शरीर में हड्डियाँ परस्पर मात्र नसों के द्वारा जुड़ी रहती है वह असप्राप्तासृपाटिका-सहनन नामकर्म कहलाता है।

असातावेदनीय – जिस कर्म के उदय में जीव अनेक प्रकार के दुःख का वेदन करता है उसे असातावेदनीय-कर्म कहते है।

अस्तिकाय – जो बहुप्रदेशी है वे अस्तिकाय कहलाते है। जीव, पुद्‌गल, धर्म, अधर्म और आकाश – ये पाँच अस्तिकायहै।

अस्तित्व – प्रत्येक द्रव्य की अनादि-अनन्त सत्ता ही उसका अस्तित्व गुण है। यह द्रव्य का सामान्य गुण है।

अस्ति-नास्ति-प्रवाद-पूर्व – जिसमें पाँच अस्तिकायो का और विविध नयो का अस्ति, नास्ति आदि अनेक पर्यायो के द्वारा वर्णन किया गया है वह अस्ति-नास्ति-प्रवाद-पूर्व नाम का चौथा पूर्व है।

अस्थिर-नामकर्म – जिस कर्म के उदय से थोड़ी भी भूख-प्यास की बाधा होने पर तथा सर्दी या गर्मी की अधिकता होने पर शरीर मे दुर्बलता का अनुभव होता है उसे अस्थिर-नामकर्म कहते है।

 अस्नान-व्रत – जीवन भर स्नान न करने की प्रतिज्ञा लेना अस्नान-व्रत है। यह साधु का एक मूलगुण है।

अहिंसा – मन, वचन, काय से किसी भी जीव को नहीं मारना अहिंसा है।

अहिंसाणुव्रत – स्थूल या संकल्पी हिंसा का त्याग करना अहिसाणुव्रत है।

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