भवनवासी एवं व्यंतरदेवों के निवासस्थान (तत्वार्थवार्तिक से)

इस रत्नप्रभा पृथ्वी के पंकबहुल भाग में असुरकुमार देवों के चौंसठ लाख भवन हैं। इस जम्बूद्वीप से तिरछे दक्षिण दिशा में असंख्यात द्वीप समुद्रों के बाद पंकबहुल भाग में चमर नामक असुरेन्द्र के चौंतीस लाख भवन हैं। इस असुरेन्द्र के चौंसठ हजार सामानिक, तेतीस त्रायस्त्रिंश, तीन सभा, सात प्रकार की…

जैन आयुर्वेद ग्रंथ : कल्याणकारकम्

आचार्य उग्रादित्य कृत कल्याणकारकम् KALYĀṆAKĀRAKAṀ तीर्थंकरों द्वारा उपदेशित द्वादशांग रूप शास्त्र के उत्तर भेद प्राणावाय पूर्व ही आयुर्वेद शास्त्रों का मूल स्रोत ग्रंथ है। इस ग्रंथ में विस्तार से अष्टांगायुर्वेद का वर्णन है। ८—९ वीं शताब्दी में जैनाचार्य उग्रादित्य ने कल्याणकारकम् नामक महान् आयुर्वेद ग्रंथ की रचना की थी। जो…

भक्तामर स्तोत्र

भक्तामर स्तोत्र (अर्थसहित – सचित्र ) भक्तामर- प्रणत- मौलिमणि – प्रभाणां– मुद्योतकम् – दलितपाप- तमोवितानम्। सम्यक्-प्रणम्य- जिनपाद- युगम्- युगादा- वालम्बनम्-भवजले- पतताम्-जनानाम्॥१॥  अर्थ : झुके हुए भक्त देवो के मुकुट जड़ित मणियों की प्रथा को प्रकाशित करने वाले, पाप रुपी अंधकार के समुह को नष्ट करने वाले, कर्मयुग के प्रारम्भ में संसार…

नमिनाथ भगवान का परिचय

परिचय इसी जम्बूद्वीपसम्बन्धी भरतक्षेत्र के वत्स देश में एक कौशाम्बी नाम की नगरी है। उसमें इक्ष्वाकुवंशी ‘पार्थिव’ नाम के राजा रहते थे और उनकी सुंदरी नाम की रानी थी। इन दोनों के सिद्धार्थ नाम का श्रेष्ठ पुत्र था। राजा ने किसी समय सिद्धार्थ पुत्र को राज्यभार देकर जैनेश्वरी दीक्षा ले…

वैज्ञानिक भगवान् महावीर

विचार की दृष्टि से जिनाणी विज्ञान है और आचार की दृष्टि से आत्म विकास का मार्ग। जाति, व्यक्ति, सम्प्रदाय आदि संकीर्ण विचारों से परे भगवान् महावीर ने Science of Creation and Spiritual Evolution का विकास जनकल्याण हेतु किया ‘नानस्स सारो आसरो’ के उद्घोष के साथ सर्वदर्शी सर्वज्ञ भगवान महावीर ने सहस्रों…

भगवान महावीर का जीवन दर्शन विश्व शांति की अमर देन

अनादिकाल से विश्व की परम्परा विद्यमान है। प्रवाहमान जगम क्रम में जैन शासन भी अपने में अनादि है। अनंत अनंत तीर्थंकरों की अपेक्षा से यह जैन शासन अनादि है। प्रत्येक तीर्थंकर की अपेक्षा से इसका तत्वर्ती प्रारंभ माना जा सकता है। जैन शासन का दीप सदा से प्रकाशमान है। इसकी…

संभवनाथ भगवान का परिचय

परिचय जम्बूद्वीप के पूर्व विदेहक्षेत्र में सीता नदी के उत्तर तट पर एक ‘कच्छ’ नाम का देश है। उसके क्षेमपुर नगर में राजा विमलवाहन राज्य करता था। एक दिन वह किसी कारण से विरक्त होकर स्वयंप्रभ जिनेन्द्र के पास दीक्षा लेकर ग्यारह अंग श्रुत को पढ़कर उन्हीं भगवान के चरण सान्निध्य में सोलह कारण भावनाद्वारा तीनों लोकों में…

जैनधर्म प्रश्नोत्तरमाला-8

प्रश्न  -भगवान ऋषभदेव का जन्म किस तिथि में कहाँ हुआ था ? उत्तर -चैत्र कृष्णा नवमी तिथि को अयोध्या नगरी में ऋषभदेव का जन्म हुआ था। प्रश्न  -भगवान ऋषभदेव के माता-पिता का क्या नाम था ? उत्तर -मरुदेवी माता थीं और नाभिराय पिता थे। प्रश्न  -भगवान ऋषभदेव के कितने पुत्र-पुत्रियाँ…

दिगम्बर—श्वेताम्बर संघभेद का समय

उज्जयिनी में जब वीर. नि.सं.४७४ में महावीर जयंती के दिन द्वि. भद्रबाहु जैन यति बने तब कुछ दिन बाद उनको उत्तर भारत में बारह वर्ष का अकाल पड़ने का संकेत मिला। निमित्त ज्ञान से उन्होंने जाना और घोषणा की कि इस भाग में १२ वर्ष का अकाल पड़ेगा अत: जहाँ…

श्रावक के ८ मूलगुण

श्रावक के ८ मूलगुण होते हैं। इनके अनेक प्रकार हैं— पुरुषार्थसिद्ध्युपाय में श्री अमृतचंदसूरि ने लिखा हैं— मद्यं मांसं क्षौद्रं पञ्चोदुम्बरफलानि यत्नेन। िंहसाव्युपरतिकामैर्मोक्तव्यानि प्रथममेव।।६१।।अन्वयार्थौ — (हिंसाव्युपरतिकामैः) हिंसा त्याग करने की कामना वाले पुरुषों को (प्रथममेव) प्रथम ही (यत्नेन) यत्नपूर्वक (मद्यं) शराब, (मांसं) मांस, (क्षौद्रं) शहद और (पंचोदुम्बरफलानि) ऊमर, कठूमर, पीपल, बड़,…

ज्योतिर्वासी देवों में उत्पत्ति के कारण

देव गति के ४ भेद हैं—भवनवासी, व्यन्तरवासी, ज्योतिर्वासी एवं वैमानिक। सम्यग्दृष्टि जीव वैमानिक देवों में ही उत्पन्न होते हैं। भवनत्रिक (भवन, व्यन्तर, ज्योतिष्क देव) में उत्पन्न नहीं होते हैं क्योंकि ये जिनमत के विपरीत धर्म को पालने वाले हैं, उन्मार्गचारी हैं, निदानपूर्वक मरने वाले हैं, अग्निपात, झंझावात आदि से मरने…

षट्काल परिवर्तन

संजय – गुरु जी! आपने कहा था कि विदेह में षट्काल परिवर्तन नहीं होता, सो वह क्या है? गुरुजी – सुनो! काल के दो भेद हैं-उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी। जिसमें जीवों की आयु, ऊँचाई, भोगोपभोग संपदा और सुख आदि बढ़ते जावें, वह उत्सर्पिणी है और जिसमें घटते जावें, वह अवसर्पिणी है। इन दोनों…