खारवेल-का-हाथीगुंफा-अभिलेख

खारवेल-का-हाथीगुंफा-अभिलेख

हाथीगुम्फा एक अकृत्रिम वृहद् गुफा है, जिसमें चेदिवंशीय महाराज खारवेल का प्रसिद्ध शिलालेख है। इस लेख में महाराज के राजकीय जीवन—संबंधी वर्ष प्रतिवर्ष की मुख्य—मुख्य घटनाएं उल्लेखित हैं। इसका आरंभ अरहंतों और सिद्धों को जैन पद्धति के अनुरूप नमस्कार करते हुए होता है। इस शिलालेख से यह निषकर्ष निकलता है कि—

१. मगध और किंलग ये प्रतिद्वन्दी राज्य थे।

 

२. अशोक की विजय से पूर्व कलिंग में जैन धर्म राजधर्म था।

३. कलिंग ने मगध के बढ़ते हुए साम्राज्य के प्रति विद्रोह किया और नन्दों ने किंलग पर विजय प्राप्त की और उनमें से कोई किंलग जिन प्रतिमा को पाटलिपुत्र ले गया।

४. कलिंग पीछे इतना स्वतंत्र हो गया कि महाराज अशोक को अत्यधिक धन—व्यय तथा नर — संहार करके किंलग को पुन: जय करने के लिए बाध्य होना पड़ा।

५. खारवेल ने मगध के साथ प्रतिशोध स्वरूप सफल युद्ध किया और किंलग जिन प्रतिमा को पुन: प्राप्त किया और जैन धर्म की राजधर्म के रूप में पुन: प्रतिष्ठा की। शिशुपाल गढ़ में १९४९ से १९५१ तक खुदाई का काम हुआ। श्री टी. एन. रामचन्द्र, के अनुसार यह शिशुपाल गढ़ संभवत: खारवेल के शिलालेख में उल्लेखित किंलग नगर ही है। संक्षेप में कहा जाये तो हाथी गुम्फा शिलालेख सम्राट खारवेल का एक जीवन्त चित्र है। उसने यहाँ की गुफाओं में अपने धर्म और स्वभाव का सुन्दर अंकन किया है। वस्तुत: जैन परम्परा की दृष्टि से उदयगिरि खण्डगिरी गुफायें बेजोड़ हैं। इनमें चित्रित जैन इतिहास और संस्कृति एक कालजयी धरोहर है। उड़ीसा में जैन धर्म का प्रवेश शिशुनाग वंशीय राजा नन्दवर्धन के समय में ही हो गया था तथा खारवेल के पूर्व भी उदयगिरि पर्वत पर अर्हन्तों के मंदिर थे। सम्राट सम्प्रति के समय में वहाँ चेदिवंश का राज्य था। इसी वंश में जैन सम्राट खारवेल हुआ जो उस समय का चक्रवर्ती राजा था। उसका एक शिलालेख उड़ीसा के भुवनेश्वर तीर्थ के पास उदयगिरि पर्वत की एक गुफा में खुदा मिला है जो हाथीगुम्फा के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें प्रतापी राजा खारवेल के जीवन वृतान्तों का वर्णन है। इस शिलालेख से ज्ञात होता है कि खारवेल ने मगध पर दो बार चढ़ाई की ओर वहाँ के राजा वहसति मित्र को पराजित किया। श्री काशीप्रसाद जायसवाल ने पुयमित्र और वसहति मित्र को एक अनुमान किया है। सूर्यवंशी अग्रिमित्र के सिक्के के समान ठीक उसी रूप का सिक्का वहसति मित्र का मिलता है। दक्षिण आंध्रवंशी राजा शातकर्णी खारवेल का समकालीन था। शिलालेख से ज्ञात होता है कि शातकर्णी की परवाह न कर खारवेल ने दक्षिण में एक बड़ी भारी सेना भेजी जिसने दक्षिण के कई राज्यों को परास्त किया। सुदूर दक्षिण के पाण्डय राजा के यहाँ से खारवेल के पास बहुमूल्य उपहार आते थे। उत्तर से लेकर दक्षिण तक समस्त भारत में उसकी विजय पताका फहराई। खारवेल एक वर्ष विजय के लिए प्रस्थित होता था तो दूसरे वर्ष महल आदि बनवाता, दान देता तथा प्रजा के हित के कार्य करता था। उसने अपनी ३५ लाख प्रजा पर अनुग्रह किया था। विजय यात्रा के पश्चात् राजसूय यज्ञ किया और ब्राह्मणों को बड़े—बड़े दान दिए। उसने एक बड़ा जैन सम्मेलन बुलाया था, जिसमें भारतभर के जैन मुनियों, तपस्वियों, ऋषियों तथा पंडितों को बुलाया था। जैन संघ ने खारवेल को खेमराजा, भिक्षु राजा और धर्म राजा की पदवी प्रदान की। यह शिलालेख ई. पू. १५-१०० के लगभग का है। ऐतिहासिकों का मत है कि मौर्यकाल की वंशपरम्परा तथा काल गणना की दृष्टि से इसका महत्त्व अशोक के शिलालेखों से भी अधिक है। देश में उपलब्ध शिलालेखों में यही एक ऐसा लेख है, जिसमें वंश तथा वर्ष संख्या का स्पष्ट उल्लेख हुआ है। प्राचीनता की दृष्टि से ये अशोक के बाद का शिलालेख माना जाता है। इसमें तत्कालीन सामाजिक अवस्था और राज्य व्यवस्था का सुन्दर चित्रण है। १७ पंक्तियों के इस शिलालेख को ज्यों के त्यों रूप में उद्धृत किया जाता है। भारत वर्ष का सर्वप्रथम उल्लेख इसी शिलालेख की दसवीं पंक्ति में भरधवत (भारतवर्ष) के रूप में मिलता है। इस देश का भारत वर्ष नाम है, इसका पाषाणेत्कीर्ण प्रमाण यही शिलालेख है। साहित्य की दृष्टि से इसका महत्त्व अधिक है।